Monday, March 25, 2019

कश्मीर के गांव से IPL तक, रसिक सलाम ने ऐसे छुआ आसमान

दाएं हाथ के युवा तेज गेंदबाज रसिक सलाम आईपीएल खेलने वाले जम्मू-कश्मीर के दूसरे क्रिकेटर बने. 17 साल के रसिक सलाम ने रविवार को दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई इंडियंस की ओर से पदार्पण किया. रसिक ने मेजबान टीम के लिए गेंदबाजी का आगाज भी किया. रसिक सलाम को भारत के पूर्व तेज गेंदबाज जहीर खान ने कैप सौंपी. वह मुंबई इंडियंस के लिए पदार्पण करने वाले सबसे युवा खिलाड़ी हैं. कुलगाम जिले के रहने वाले रसिक सलाम को मुंबई इंडियंस ने 20 लाख रुपये के उनके आधार मूल्य पर खरीदा था.

ऑफ स्पिन ऑलराउंडर परवेज रसूल इस लुभावने टूर्नामेंट में खेलने वाले जम्मू-कश्मीर के पहले क्रिकेटर हैं. वह पुणे वॉरियर्स और सनराइजर्स हैदराबाद का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. पिछले साल किंग्स इलेवन पंजाब ने जम्मू-कश्मीर के मंजूर डार को चुना था, लेकिन उन्हें कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला. हालांकि अपने पहले मैच में रसिक अपना प्रभाव छोड़ने में ज्यादा कामयाब नहीं हो पाए. उन्होंने अपने कोटे के 4 ओवरों में 42 रन खर्च कर डाले, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

रसिक सलाम ने इसी साल जनवरी में प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया था. जम्मू-कश्मीर टीम के लिए रसिक सलाम ने अब तक दो रणजी मुकाबले खेले हैं और 7 विकेट निकाले. रसिक सलाम ने फरवरी में सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी (टी-20) में डेब्यू किया. रसिक ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर के लिए विजय हजारे ट्रॉफी (50 ओवर) में डेब्यू किया था.

पेशे से शिक्षक ए. सलाम डार के सबसे छोटे बेटे रसिक सलाम ने अन्य बच्चों की तरह छोटी उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया. तब वह इस बात से अनजान होगा कि एक दिन बल्ले और गेंद का यह खेल उसे सुर्खियों में शामिल करेगा. अपने आयुवर्ग में आगे चल रहे दाएं हाथ के इस तेज गेंदबाज ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर अंडर-19 टीम में अपना हाथ आजमाया, लेकिन तब चयनकर्ताओं ने उसे नजरअंदाज कर दिया था. वह निराश जरूर हुआ, लेकिन क्रिकेट के प्रति उसका जुनून कभी कम नहीं हुआ.

रसिक की किस्मत बदलने में देर नहीं लगी. एक साल बाद ही वह अपने राज्य का क्रिकेट 'स्टार' बना गया. रसिक सलाम को राज्य स्तरीय क्रिकेट खेले बिना ही विजय हजारे ट्रॉफी में जम्मू-कश्मीर की सीनियर टीम में सीधे प्रवेश मिल गया, जो देश का एक प्रमुख घरेलू टूर्नामेंट है. सच तो यह है कि वह कुछ महीने पहले तक एक अनजान क्रिकेटर था, लेकिन जैसे ही वह भारत के स्टार क्रिकेटर इरफान पठान के संपर्क में आया, उसका जीवन बदल गया. इरफान पठान ने जम्मू-कश्मीर टीम के मौजूदा मेंटर और खिलाड़ी के तौर पर अगस्त में नई पारी शुरू की है.

जिला स्तरीय टूर्नामेंट में बेहद अच्छा प्रदर्शन करने के बाद रसिक सलाम को टैलेंट हंट कैंप में भाग लेने के लिए चुन लिया गया. यह टैलेंट हंट कैंप इरफान पठान के जिम्मे था. एसके स्टेडियम (श्रीनगर) में कैंप शुरू हुआ. इस दौरान रसिक के साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसके बारे में उसने खुद भी नहीं सोचा होगा.

रसिक सलाम एक इंटरव्यू में कह चुके हैं, 'जब मुझे गेंद दी गई, तो मैंने अपने आप से कहा कि यह दिन खुद को साबित करने का दिन है. मैंने तीन गेंदें ही फेंकी थीं कि इरफान सर ने मुझे बुलाया, उन्होंने कहा-  इतनी कम उम्र में कोई इतनी तेज गेंद कैसे डाल सकता है. तुम्हारा क्या नाम है? वह मुझे अपने साथ परवेज भैया (परवेज रसूल) के पास ले गए और कैंप के समापन के बाद मिलने के लिए कहा.'

इसके बाद रसिक सलाम को इरफान पठान और जम्मू-कश्मीर के कोच मिलाप मवांडे के साथ नेट्स पर कई उपयोगी टिप्स लेते देखा गया. और यहीं से रसिक सलाम क्रिकेट की ऊंचाइयां छूने की ओर ओर तेजी से आगे बढ़ने लगा.

Monday, March 18, 2019

दलित औरतों के तन ढंकने का संघर्ष NCERT की किताबों से ग़ायब: प्रेस रिव्यू

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ एनसीईआरटी ने नौवीं क्लास की इतिहास की किताब से भारत में जातीय भेदभाव से संबंधित तीन चैप्टर हटा दिए हैं.

इन चैप्टरों में से एक में केरल की दलित महिलाओं के कथित ऊंची जाति के लोगों से संघर्ष की कहानी बताई गई थी.

18वीं सदी के आसपास त्रावणकोर में 'नादर' समुदाय की महिलाओं को अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा खुला रखने के लिए मजबूर किया जाता था.

तक़रीबन 50 साल के लगातार संघर्ष के बाद नादर महिलाओं को अपना शरीर ढंकने का हक़ मिला.

हालांकि ईसाई मिशनरियों से प्रभावित होकर नादर महिलाओं ने ब्लाउज पहनना शुरू करके इस कुप्रथा का विरोध करना शुरू कर दिया.

किताब से जिस चैप्टर को हटाया गया है, उसमें लिखा था:

"मई, 1822 में नायर समाज (तथाकथित ऊंची जाति) के लोगों ने त्रावणकोर में नादर महिलाओं पर सरेआम हमला किया था. ऐसा इसलिए क्योंकि नादर महिलाओं ने उनके बनाए नियमों के ख़िलाफ़ अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को ढंक रखा था. इसके कई दशकों के बाद हिंसक संघर्ष की वजह से आख़िरकार इस 'ड्रेस कोड' का अंत हुआ."

अख़बार सूत्रों के हवाले से लिखता है कि जावडेकर का एनसीआरटी को सुझाव ये था कि सभी विषयों का सिलेबस (पाठ्यक्रम) कम किया जाए लेकिन एनसीईआरटी ने सामाजिक विज्ञान का सिलेबस लगभग 20% कम कर दिया.

वहीं, दूसरी तरफ़ गणित और विज्ञान के सिलेबस में सबसे कम कटौती की गई है.

एनसीईआरटी का कहना है कि ये बदलाव छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों की एक लाख से ज़्यादा राय मिलने पर किए गए हैं.

दिलचस्प ये है कि इन्हीं बदलावों के तहत एनसीआईरटी ने आठवीं कक्षा की हिंदी की किताब में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी एक कविता शामिल की है.

किताब में यह कविता केंद्र सरकार के सुझाव के बाद शामिल की गई है. सरकार का कहना है कि ये भूतपूर्व प्रधानमंत्री के योगदान और उपलब्धियों को ज़िंदा रखने की एक कोशिश है.

ओबीसी वर्ग के 'क्रीमी लेयर' की समीक्षा का प्रस्ताव
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ केंद्र सरकार ने ओबीसी यानी अन्य पिछड़ी जातियों के लिए निर्धारित 'क्रीमी लेयर' के आधार की समीक्षा करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित की है.

सरकार का कहना है कि क्रीमी लेयर के नियमों को लागू करने में कई तकनीकी कठिनाइयां आ रही थीं और इसलिए इन्हें आसान करने की ज़रूरत महसूस हुई.

साल 1993 के बाद से अब यानी तक़रीबन 26 साल बाद सामाजिक न्याय मंत्रालय ने मामले की समीक्षा के लिए 8 मार्च को एक समिति गठित की. इस समिति को 15 दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी.

केंद्र सरकार के इस फ़ैसले पर एक बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि 'राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग' (NCBC) की मौजूदगी, उसके संवैधानिक दर्जे और तमाम शक्तियों के बावजूद सरकार ने क्रीमी लेयर की समीक्षा के लिए अलग से विशेषज्ञों की समिति क्यों गठित की?

भारत को मिल सकता है पहला लोकपाल
दैनिक जागरण समेत कई अख़बारों में ख़बर है कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ट जज जस्टिस पीसी घोष यानी जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष देश के पहले लोकपाल हो सकते हैं.

लोकपाल की चयन समिति ने लोकपाल अध्यक्ष और आठ सदस्यों के नाम तय कर लिए हैं. माना जा रहा है कि समिति ने लोकपाल अध्यक्ष के लिए जस्टिस पीसी घोष का चयन किया है।

जल्दी ही सरकार की ओर से औपचारिक घोषणा होने की उम्मीद है. जस्टिस घोष फ़िलहाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं. लोकपाल क़ानून के तहत इसकी जांच के दायरे में प्रधानमंत्री भी आएंगे. लोकपाल सीबीआई समेत सभी जांच एजेंसियों को निर्देश दे सकता है.

केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त सरकारी कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर सकेंगे.

'निधन से घंटे भर पहले कामकाज की बातें कर रहे थे पर्रिकर'
आज सभी के अख़बारों के पहले पन्ने पर मनोहर पर्रिकर के निधन की ख़बरें और उनकी अलग-अलग तस्वीरें ही प्रमुखता से दिख रही हैं.

इसके अलावा अख़बारों ने गोवा के पूर्व सीएम की ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं को याद करते हुए ख़ास क़ॉलम लिखे हैं और उन्हें श्रद्धांजलि दी है.

कुछ अख़बारों ने उनकी सादगी के बारे में लिखा है तो कुछ ने उनके हाफ़ बाजू वाली शर्ट चश्मे की स्टाइल के बारे में भी. कहीं, उनकी सेना के साथ तस्वीरें हैं तो कहीं नाक में नली लगाए काम संभालते हुए.

दैनिक भास्करने अपने पहले पन्ने पर उनकी फ़ुटबॉल खेलती हुई तस्वीर छापी है और लिखा है- कैंसर था लेकिन रोज़ काम करते रहे.

अख़बार गोवा विधानसभा के अध्यक्ष राजेंद्र आर्लेकर के हवाले से लिखता है कि पर्रिकर अपने निधन से तक़रीबन एक घंटे पहले तक कामकाज की बातें ही कर रहे थे.

इसके अलावा दैनिक भास्कर ने मनोहर पर्रिकर से जुड़ा एक वाकया भी शेयर किया है.

अख़बार लिखता है कि पर्रिकर साल 2012 में गोवा के पर्यटन मंत्री मातनही सलदन्हा की मौत पर फूट-फूटकर रोए थे. जब मातनही बीमार पड़े तो पर्रिकर लगातार उनके बिस्तर के सिरहाने बैठे रहे और डॉक्टरों ने जब उनसे घर जाने को कहा तो उन्होंने कहा कि मैं उस आदमी को छोड़कर घर कैसे चला जाऊं जो इतने सालों तक मेरे साथ बना रहा.

Friday, March 15, 2019

आधुनिक तकनीक ने बढ़ाया नौकरियों पर ख़तरा

हैरत की बात है कि पिछले महीने मैं जिस एक वीडियो में थी उसे एक करोड़ 80 लाख बार देखा जा चुका है. यह वीडियो करों और अच्छी नौकरियों से संबंधित था.

इसका शीर्षक था- एक न्यायोचित दुनिया की तलाश में हम सभी इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं.

जिन लोगों ने देखा उनमें से 60 प्रतिशत से अधिक 30 वर्ष से कम उम्र के थे. इससे ये उम्मीद बंधी है कि इतने सारे युवाओं में मेरी बात का कुछ असर हुआ है. किसी भी सभ्य समाज में पहचान अच्छी नौकरी से मिलती है लेकिन ये नौकरियां खुद ब खुद नहीं मिलतीं. आज और भविष्य के नेता उचित राजनीतिक, न्यायिक और आर्थिक माहौल बनाकर दुनियाभर में लाखों लोगों का जीवन सुधार सकते हैं.

आज 19 करोड़ 30 लाख लोगों के पास काम नहीं है और 1.4 अरब लोग असुरक्षित नौकरियों में हैं. दुनियाभर में 30 करोड़ मजदूर अत्यन्त गरीबी में रहते हैं. इनमें से 40 प्रतिशत विकासशील देशों में हैं. पिछले वर्ष अरबपतियों की कुल सम्पत्ति 2.5 अरब डॉलर (1.9 अरब पाउंड) प्रतिदिन की दर से बढ़ी जबकि दुनिया की आधी आबादी, 3.8 अरब लोग 50 करोड़ डॉलर प्रतिदिन की दर से और गरीब हुए.

दुनियाभर में 30 करोड़ मजदूर अत्यन्त गरीबी में रहते हैं , इनमें से 40 प्रतिशत विकासशील देशों के हैं.

विकास का महान इंजन यानी पूंजीवाद असमानता का भी एक महान उपकरण बन गया है. हमारे समाज अब यह उम्मीद खोने लगे हैं कि सभी नागरिकों को इस समृद्धि का उचित हिस्सा मिलेगा. हम अपने लोकतांत्रिक संस्थानों में भरोसा खोने लगे हैं जिससे असुरक्षा, एकाकीपन और लोक-लुभावनपन को बढ़ावा मिल रहा है.

लैंगिक असमानता और शासन
सरकारें जो एक सबसे शक्तिशाली कदम उठा सकती हैं वह है, लैंगिक असमानता कम करना तथा महिलाओं में फैली गरीबी दूर करना (प्रतिदिन महिलाओं द्वारा लाखों घंटे का ऐसा करना जिसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता) इससे महिलाओं के लिए शैक्षणिक, राजनीतिक और आर्थिक अवसर बढ़ेगे. यह कोई असंभव कार्य नहीं है. हाल ही में आइसलैंड दुनिया का पहला देश बना जिसमें पुरुष तथा महिलाओं में कानूनी रूप से बराबर वेतन को लागू कर दिया है.

पुरुष महिलाओं की तुलना में दोगुना सम्पत्ति तथा दुनिया की 86 प्रतिशत कंपनियों पर नियंत्रण रखते हैं. अनुपात के विपरीत महिलाओं को ऐसे कार्य में लगा दिया गया है, जिसके लिए भुगतान नहीं होता जैसे बच्चों की देखभाल, साफ-सफाई, खाना पकाना, पानी लाना, इत्यादि. यह काम लगभग 100 खरब अमरीकी डॉलर प्रतिवर्ष की कमाई जितना है लेकिन इसे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में जोड़ा नहीं जाता.

जब स्कूली शिक्षा मुफ्त हो जाए तो उसका सबसे अधिक फायदा लड़कियों को मिलता है क्योंकि यदि शिक्षा पर खर्च हो रहा हो तो परिवार लड़कियों की शिक्षा पर सबसे अन्त में ध्यान देता है

स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जल, और पेंशन, बच्चों के लिए मदद तथा बच्चों की देखभाल जैसे बेहतर सामाजिक सुरक्षाओं को प्रदान कर सरकारें इनमें बदलाव ला सकती हैं. जब स्कूली शिक्षा मुफ्त हो जाए तो उसका सबसे अधिक फायदा लड़कियों को मिलता है क्योंकि यदि शिक्षा पर खर्च हो रहा हो तो परिवार लड़कियों की शिक्षा पर सबसे अन्त में ध्यान देता है.

रियो डी जैनेरियो शहर ने बच्चों की मुफ्त सरकारी देखभाल उपलब्ध कराकर कम आय वाली मांओं के रोजगार दर में 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है. केवल स्वच्छ पेयजल उपलब्धता बढ़ाकर ही जिम्बाब्वे के कुछ हिस्सों में महिलाओं पर पड़ने वाले देखभाल के भार में औसतन चार घंटे प्रतिदिन की कमी कर ली गई है.

हमें इन सभी सुविधाओं के लिए भुगतान करना चाहिए और हम ऐसा कर सकते हैं. विकासशील देशों में कर चोरी से प्रतिवर्ष 170 अरब डॉलर का भार पड़ता है. अब भी कम से कम 76 खरब अमरीकी डॉलर की रकम कर अधिकारियों की नज़र में नहीं आई है. बड़ी कंपनियां और अत्यन्त अमीर लोग पहले के मुकाबले कम दरों पर कर का भुगतान कर रहे हैं. दुनिया के सबसे समृद्ध एक प्रतिशत लोगों पर यदि कर की दर केवल 0.5 प्रतिशत बढ़ा दी जाए, तो इससे इतनी आय होगी कि वर्तमान में स्कूल न जाने वाले प्रत्येक बच्चे को शिक्षित किया जा सकेगा और 30 लाख लोगों को जीवन रक्षक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी.

इस तरह की कर पहलों से आर्थिक फायदे भी मिलते हैं. मध्यम आय वाले छह देशों में शोध से पता चलता है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दो प्रतिशत आय को यदि स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं में लगाया जाए तो इससे एक से तीन प्रतिशत की दर से रोजगार वृद्धि हो सकेगी.

1970 के दशक से अधिकांश उद्योग इस बात पर जोर देते थे कि किसी भी कंपनी का मुख्य कर्तव्य अपने शेयर धारकों के लिए अधिक से अधिक लाभ कमाना है. उदाहरण के लिए वर्ष 2018 में ब्रिटेन की कंपनियों ने अपने शेयर धारकों को लगभग 100 अरब पाउंड (129 अरब अमरीकी डॉलर) का रिकॉर्ड भुगतान किया था जबकि एक औसत कर्मचारी की आय उतनी ही रही. जहां बहुत सारी कंपनियां अपने सामाजिक दायित्वों को लेकर सजग रहती हैं, उनका मुख्य उद्देश्य फिर भी लाभ कमाना ही रहता है.

लेकिन इसके कई सफल विकल्प हैं मसलन , सामाजिक उद्यम, कोऑपरेटिव तथा कर्मचारियों और किसानों द्वारा चलाए जाने वाले संगठन. स्पेन का मॉन ड्रैगन अपने दसियों हजार कर्मचारियों के स्वामित्व और उनके निर्णायक फैसलों की वजह से प्रतिवर्ष 10.5 अरब पाउंड का व्यवसाय करता है.

इस कंपनी में सर्वाधिक और न्यूनतम वेतन के बीच केवल आठ गुना का फर्क है. अमरीका और यूरोप में भी इस तरह के सामाजिक उद्यम जीडीपी के 10 प्रतिशत तक का योगदान करते हैं और परम्परागत निजी क्षेत्र की तुलना में दोगुना तेजी से रोजगार उपलब्ध कराते हैं.

लेकिन ऐसे व्यवसाय उन प्रतिद्वन्द्वियों के आगे हार जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना है.

ऐसे में सरकारें उन उद्यमियों पर जुर्माना लगा सकती हैं जो अपने कर्मचारियों या सप्लायरों को उचित भुगतान नहीं करते. जैसे कि इक्वाडोर की सरकार ने केला उद्योग में काम करने वाले मजदूरों और उत्पादकों के लिए ठीक यही किया. सरकार ने सभी कंपनियों पर लाभांश का भुगतान करने से तब तक रोक लगा दी जब तक कि सभी मजदूरों को एक उचित आय न हो जाए. एक्जीक्यूटिव कर्मचारियों तथा मजदूरों के अनुपात में सुधार, तथा उन्हें बोर्ड में सदस्यता देने से कंपनियों तथा मजदूरों के बीच शक्ति संतुलन सुधरेगा.

Monday, March 11, 2019

10 बड़ी वजहें, आखिर क्यों फिर जीत की ओर अग्रसर हैं PM मोदी

चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव का बिगुल बजाने के साथ ही जंग की वास्तविक शुरुआत हो चुकी है. चुनाव मैराथन दौड़ के साथ ही एक लंबी बाधा दौड़ भी होते हैं, जिनमें कई अवरोध और ऊंच-नीच आते हैं. इसलिए दौड़ की शुरुआत में ही कोई अनुमान लगाना घातक साबित हो सकता है. फिर भी, मैं आपको 10 ऐसी वजहें बताता हूं जिनसे मुझे ऐसा लगता है कि फिलहाल तो मोदी साफतौर पर सबसे आगे दिख रहे हैं.

1. आज का चुनाव मनी, मशीन और मीडिया का है

आज का चुनाव मनी, मशीन और मीडिया का है और टीम मोदी को इसमें भारी बढ़त हासिल है. भारतीय चुनावों के इतिहास में कभी भी मीडिया की सोच इतनी एकतरफा नहीं रही है. सत्तारूढ़ पार्टी के पास विशाल धनबल है और सभी प्लेफॉर्म पर वोटर्स से जुड़ने की पार्टी की मशीनरी बखूबी समायोजित है.

इस तरह बीजेपी जहां एक चमचमाती, अच्छी तरह से तैयार फरारी जैसी है तो उसकी तुलना में कांग्रेस एक सेकंड हैंड पुराने जमाने की एम्बेसडर जैसी दिख रही है. इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि बीजेपी अभी ही अपने प्रतिस्पर्ध‍ियों के मुकाबले कई गुना खर्च कर चुकी है.

2. अब भी नेता नंबर वन हैं मोदी

अब भी मिस्टर मोदी काफी गैप के साथ नंबर वन नेता हैं. चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने अथक ऊर्जा, बेहतरीन संचार कौशल और पार्टी के कद से भी ज्यादा वार करने की क्षमता दिखाई है. 'मोदी है तो मुमकिन है' नारे के साथ बीजेपी और सरकार को शीर्ष एक करिश्माई नेतृत्व मिला है. तारीफों की आवाज चीयरलीडर्स जैसी विशाल सेना की वजह से कई गुना बढ़ जाती है और हाइप बना रहता है. यह 70 के दशक के अमिताभ बच्चन के मूवी जैसा मामला है जिसमें खराब पटकथा भी फिल्म को बंपर ओपनिंग से रोक नहीं सकती थी. पीएम मोदी का विशाल कद बीजेपी को लगातार ऊर्जा दे रहा है. उन्होंने चुनाव घोषणा से पहले ही इतनी रैलियां और आयोजन कर लिए हैं, जितना कि उनके सभी मुख्य प्रतिद्वंद्वी मिलकर नहीं कर पाए हैं.

हां, यह सच है कि लोकलुभावन जुमलों और लगातार इवेन्ट मार्केटिंग जैसे प्रयासों से, जो अक्सर जमीनी सच्चाई से परे होते हैं, लोगों में निराशा भी है, लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि यह वोटरों की नाराजगी में बदली है. मोदी का गुब्बारा उस तरह से फूटा नहीं है, उनकी सतर्कता से बनाई क‍ठोर मेहनत करने वाले 'कर्मयोगी' और राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा जोखिम लेने के साहस रखने वाले नेता की छवि काफी हद तक बनी हुई है और बालाकोट को उनके निर्णायक नेतृत्व का नवीनतम उदाहरण माना जा रहा है.

3. अमित शाह की इलेक्शन इंजीनियरिंग

पीएम मोदी और बीजेपी को अमित शाह की इलेक्शन 'इंजीनियरिंग' का लाभ मिल रहा है. साल 2014 में अमित शाह यूपी के इंजार्ज थे और राज्य में बीजेपी को जबर्दस्त सफलता मिली. साल 2019 में पार्टी अध्यक्ष के रूप में वह अब पूरे देश में बीजेपी के इंचार्ज हैं. हालांकि, भारतीय राजनीति में 'सबके लिए कोई एक फॉर्मूला' कारगर नहीं होता- शाह के नेतृत्व में बीजेपी को 2015 में दिल्ली और बिहार में बड़ी हार मिल चुकी है. लेकिन संसाधनों से लबरेज और निर्दयी शाह 'साम, दाम, दंड, भेद' के मूर्तरूप हैं, उनका राजनीतिक दर्शन है कि 'साधन से ज्यादा साध्य ज्यादा मायने रखता है.'

इसके अलावा, संघ के समर्पित कार्यकर्ता, बूथ तक मौजूद कार्यकर्ता और बीजेपी का मजबूत संगठन संभावित मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच को आसान बनाते हैं.

4. कांग्रेस की खराब हालत

हिंदी पट्टी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों में जीत मिलने के तीन महीने के बाद कांग्रेस वह रफ्तार नहीं बनाए रख पाई है. मोदी सरकार ने तेजी से अपनी कमजोरियों को दूर किया है और किसानों, ऊंची जातियों, मध्यम एवं लघु उद्योगों आदि के लिए कई राहतों की घोषणा की है. गुटबाजी, भितरघात और निर्णय लेने में सुस्ती की वजह से यह काफी पुरानी पार्टी अवसरों को अपने लिए भुना नहीं पा रही है. सच तो यह है कि कांग्रेस आईसीयू से बाहर जरूर आ गई है, लेकिन उसे तत्काल पुनर्वास कार्य की जरूरत है. ऐसे राज्यों में जहां सीधे बीजेपी बनाम कांग्रेस की लड़ाई है, वहां बीजेपी फायदे में रह सकती है.

5. राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रहस्यों में लिपटी हुई एक पहेली बने हुए हैं. साल 2017 में गुजरात की लड़ाई और 2018 दिसंबर के विधानसभा चुनावों से उन्हें एक जुझारू प्रचारक के रूप में सम्मान जरूर मिला है, लेकिन उन्होंने अब भी ऐसा कोई संगठनात्मक या मानव प्रबंधन कौशल, या प्रखर राजनीतिक ज्ञान नहीं दिखाया है, जिसकी वजह से उन्हें सत्ता का स्वाभाविक दावेदार और समूचे विपक्ष के लिए आकर्षण माना जा सके. उदाहरण के लिए उन्होंने मायावती या ममता तक व्यक्तिगत स्तर पर पहुंचने की कोई कोशिश नहीं की. राफेल केंद्रित उनका प्रचार अभियान भी दोधारी तलवार जैसा है, क्योंकि इससे कृषि संकट, नौकरियों जैसे महत्वपूर्ण मसलों से ध्यान हट रहा है.

6. महागठबंधन की पहेली

विपक्ष अब भी एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम या एक साझे मंच के साथ हमला करने के लिए तैयार नहीं है, जो मोदी विरोध से परे हो या किसी ऐसे सामूहिक नेतृत्व की पहचान कर सके, जो 'मोदी बनाम कौन' के नैरेटिव को चुनौती दे सके. सभी 543 सीटों पर एक साझे मोर्चे पर लड़ने की जगह विपक्ष अब वोट विभाजित होने के जोखिम का सामना कर रहा है, खासकर यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में. कांग्रेस को यह सोचना होगा कि यह चुनाव उसके अपने उभार के लिए है या देश भर में बीजेपी को घटाने के लिए? इसी तरह, मायावती जैसे क्षेत्रीय राजनीतिज्ञों को भी यह सोचना होगा कि वे चुनाव के पहले ही गठबंधन के बारे में मजबूत निर्णय लें.

7. आंकड़ों के हिसाब से भी बीजेपी मजबूत

साल 2014 में उत्तर और पश्चिम भारत में बीजेपी को करीब 90 फीसदी सीटों पर जीत मिली थी. इस तरह का प्रदर्शन तो इस बार संभव नहीं लगता, लेकिन बीजेपी इस बार भी इस इलाके में अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले 75 से 100 सीटें ज्यादा पा सकती है. यह नहीं भूलना चाहिए कि 2014 के चुनाव में बीजेपी ने 42 लोकसभा सीटें 3 लाख से ज्यादा वोट से, 75 सीटें 2 लाख से ज्यादा वोट से और 38 सीटें 1.5 लाख से ज्यादा वोटों से जीती हैं. तो बीजेपी को इस बार सबसे बड़े राजनीतिक दल बनने से रोकने के लिए उसके विपरीत भारी झुकाव की जरूरत होगी. बीजेपी को 200 सीटों से ज्यादा मिलती है, तो एनडीए की सरकार फिर से बन सकती है.

8. यूपी जैसा महत्वपूर्ण राज्य

यूपी में सपा-बसपा गठबंधन को लेकर विपक्ष में तो भारी चर्चा है और उत्साह है और उसी तरह से प्रियंका गांधी वाड्रा के 'औपचारिक' तौर पर राजनीति में शामिल होने का भी. लेकिन बुआ-भतीजा का गठबंधन अब भी जमीनी समीकरणों से दूर है. उदारहण के लिए यह देखना होगा कि क्या यादव वोटर आसानी से बसपा की तरफ जाएगा? इसी तरह प्रियंका के राजनीति में उतरने का भी कोई खास असर होता नहीं दिख रहा.

दूसरी तरफ, बीजेपी ने यूपी में अपना काफी कुछ झोंक दिया है. राज्य में बीजेपी यदि 2014 के 73 के मुकाबले आधी सीटें भी जीत पाई तो मोदी सरकार को फिर आने से कोई नहीं रोक पाएगा. तो दिल्ली का रास्ता निश्चित लग रहा है कि इस बार भी लखनऊ से ही होकर जाएगा.

9. पुलवामा, पाकिस्तान, बालाकोट एयरस्ट्राइक

जयश्रीराम से भारत माता की जय तक, बाबर की औलाद से पाकिस्तानी जिहादी तक, भगवा धारी साधु-संतों से लेकर सेना की वर्दी धारण करने वालों तक, मोदी सरकार पुलवामा और बालाकोट के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक रिवायतों के केंद्र में लाए. आक्रामक राजनीति का यह ब्रांड हो सकता है कि सीमांत ग्रामीण इलाकों और दक्षिण भारत में सीमित असर डाले, लेकिन यह शहरी इलाकों और महत्वपूर्ण हिंदी पट्टी में काफी कुछ बदल सकता है.

10. 'हिदुत्व' वाला नया युवा वोटर

चुनाव आयोग के मुताबिक देश में 8.4 करोड़ लोग पहली बार वोट डालने जा रहे हैं, जो कि कुल मतदाताओं का करीब 10 फीसदी हैं. यह ऐसा वोटर है जिसके दिमाग में बाबरी मस्जिद के ढहने या 2002 के गुजरात दंगों की कोई स्मृति नहीं है. यह वह युवा जनसंख्या है, जो मोदी के 'न्यू इंडिया', 'मजबूत सरकार', 'हाऊ इज द जोश' जैसे नारों से प्रभावित है. इस युवा जनसंख्या को यह बात प्रभावित करती है कि 'आतंकवाद पर सख्त नीति होनी चाहिए', 'चलो पहले कश्मीर मसला निपटा लें'. बीजेपी के मुख्य मध्य वर्गीय हिंदू दक्ष‍िणपंथी समर्थकों को 'बदमाश' इस्लामी देश पाकिस्तान से टकराव सूट करता है. अगर विपक्ष एक होकर 'किसान-नौजवान' की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा केंद्रित चर्चा को आगे नहीं बढ़ाता, तो बीजेपी का मजबूत राष्ट्रवाद निश्चित रूप से 2019 का एजेंडा सेट करेगा.

शर्तें लागू: यहां मैं साल 2004 के चुनाव के पहले बने माहौल का उल्लेख करना चाहूंगा. आज के माहौल की तरह तब भी यही लगता था कि अटलजी के अलावा और कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. उनका भी फिर से चुना जाना आज के पीएम मोदी से भी ज्यादा प्रबल माना जा रहा था. लेकिन वह हार गए, क्योंकि दक्ष‍िण के दो राज्यों तमिलनाडु और आंध्र के उनके सहयोगी छिटक गए थे और यूपी 'शाइनिंग इंडिया' के नारों से प्रभावित नहीं हुआ. कोई भी लहर राजधानी के इको चैम्बर या तात्कालिक स्टूडियो विश्लेषण से नहीं पैदा होती, बल्कि देश के आंतरिक इलाकों के धूल-धक्कड़ में बनती है. इसी वजह से भारत के मतदाता का व्यवहार कुछ-कुछ लंदन के मौसम जैसा है, जो हमेशा बदलता रहता है.

Tuesday, March 5, 2019

अमरीका का फ़ैसला, भारत को नहीं देंगे तरजीह

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमरीका भारत और तुर्की से होने वाले करोड़ों डॉलर के ड्यूटी फ्री सामान के आयात पर रोक लगाना चाहता है.

कांग्रेस को लिखे एक पत्र में ट्रंप ने कहा कि भारत ने अमरीका से होने वाले आयात पर लगने वाला आयात शुल्क बढ़ा दिया है, और तुर्की अब विकासशील देश नहीं रहा.

ट्रंप ने इस पत्र में लिखा, "भारत सरकार के साथ काफी चर्चा के बाद मैं ये क़दम इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि भारत ने अब तक अमरीका को इस बात का आश्वासन नहीं दिया है कि वो अपने बाज़ारों तक अमरीका को समान और उचित पहुंच देगा."

साल 1970 से अमरीका ने एक ख़ास आयात नीति अपनाई थी. इस योजना के तहत अमरीका में भारत और तुर्की को एक विकासशील देश के तौर पर तरजीही मुल्क का दर्जा प्राप्त है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इस योजना के तहत भारतीय बाज़ार को सहरा देने के लिए भारत का 5.6 बिलियन डॉलर यानी 560 करोड़ डॉलर का सामान अमरीकी बाज़ारों में बिना आयात शुल्क के पहुंचता है.

ट्रंप का कहना है इसके इतर अमरीका से होने वाले आयात पर भारत अधिक आयात शुल्क लगाता है. ट्रंप ने कई बार कहा है कि वो अमरीका के व्यापार घाटे को कम करेंगे. वो भारत के अधिक आयात शुल्क लगाने को अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हैं.

डोनल्ड ट्रंप का कहना है कि भारत को, अमरीका को अपने बाज़ारों तक न्यायसंगत और उचित पहुंच देना चाहिए था लेकिन भारत इस तरह का आश्वासन देने में कामयाब नहीं हुआ है.

भारत और अमरीका के बीच राजनीतिक और सुरक्षा स्तर पर गहरे संबंध हैं लेकिन व्यापार के स्तर पर दोनों देशों के संबंध बिगड़ रहे हैं.

अमरीका के व्यापारिक प्रतिनिधि दफ्तर ने एक बयान जारी कर कहा कि व्यापार के मामले में भारत और तुर्की को अमरीका तरजीही राष्ट्र के तौर पर देखता है.

लेकिन अब अमरीका मानता है कि तुर्की आर्थिक रुप से विकसित देश है और इस कारण उसे अमरीकी बाज़ार में तरजीह देने की अब कोई ज़रूरत नहीं रही.

बयान में कहा गया है कि कांग्रेस के इस आदेश को पारित करने के बाद ये राष्ट्रपति अधिसूचना के रूप में लागू किया जाएगा, लेकिन इसके लागू होने में 60 दिन का वक्त लगेगा.

व्यापारिक प्रतिनिधि दफ्तर के बयान के अनुसार अप्रैल 2018 में इस बात पर पुनर्विचार करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी कि भारत को तरजीही राष्ट्र बनाए रखना चाहिए या नहीं. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत ने कई तरह के व्यापार प्रतिबंध लगाए हैं जिसका अमरीका के व्यापार पर पड़ रहा है.

अमरीका के व्यापारिक प्रतिनिधि के बयान पर भारतीय वाणिज्य मंत्रालय की सचिव अनूप धवन ने बीबीसी संवाददाता देविना गुप्ता को बताया कि भारत को तरजीही राष्ट्र की सूची ने हटाने पर भारत की अर्थव्यवस्था पर अधिक असर नहीं होगा, इसका असर क़रीब 190 मिलियन डॉलर यानी करीब 19 करोड़ डॉलर तक ही होगा.

वो कहते हैं, "अमरीका के साथ हमारे व्यापारिक संबंध अच्छे रहेंगे. दोनों के बीच व्यापार मुद्दे पर होने वाली बातचीत भी जारी रहेगी. अमरीकी उत्पादों पर भारत जो आयात शुल्क लगता है वो विश्व व्यापार संगठन के बताए दरों की सीमा में ही हैं."

"अमरीकी सरकार के साथ हमारी बातचीत जारी है और हम कुछ अमरीकी उत्पादों को भारत के बाज़ार तक सशर्त पहुंच देने के लिए तैयार हैं. इनमें अमरीकी खेती और डेयरी से जुड़े सामान शामिल हैं. हम आईटी उत्पादों पर भी ड्यूटी कम करने के लिए तैयार हैं और साथ ही मेडिकल के उत्पादों पर भी शुल्क कम करने के लिए राज़ी है लेकिन ये दुर्भाग्य की बात है कि अमरीका के साथ हमारी बातचीत सफल नहीं हुई."

साल 2017 में भारत के साथ अमरीकी सामान और सेवा व्यापार घाटा 27.3 बिलियन डॉलर (2730 करोड़ डॉलर) का था.

अमरीका की तरजीही राष्ट्र की नीति के तहत सबसे अधिक फ़ायदा पाने वाले राष्ट्रों में भारत सर्वप्रथम है.

इस सूची में से भारत को हटाना ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से भारत के ख़िलाफ़ उठाय जाने वाला सबसे बड़ा कदम होगा. माना जा रहा है कि भारत में जल्द चुनव होने वाले हैं और अमरीका के इस कदम से भारत की सत्ताधारी भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं.