Wednesday, January 23, 2019

आतंकवादी से फौजी बने शहीद नजीर वानी को मिलेगा अशोक चक्र, 6 आतंकियों से ली थी टक्कर

आतंकवाद का रास्ता छोड़कर सेना में शामिल होने वाले लांस नायक नजीर वानी को अशोक चक्र अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा. ये पहला मौका है जब आतंक की नापाक राह से लौटे किसी जवान को देश के इतने बड़े सम्मान से नवाजने का निर्णय लिया गया है.

नजीर वानी ने 2004 में आत्मसमर्पण किया था. इसके कुछ वक्त बाद ही नजीर ने भारतीय सेना ज्वॉइन कर ली थी. कभी सेना के खिलाफ लड़ने वाले इस बहादुर जवान ने आतंकवादियों से लड़ते हुए नवंबर, 2018 में अपनी जान वतन के नाम कुर्बान कर दी थी.

दरअसल, पिछले साल नवंबर में शोपियां में कुछ आतंकियों के छुपे होने की खबर पर सुरक्षाबलों की टीम उन्हें मौत के घाट उतारने पहुंची थी. इस दौरान 6 आतंकवादियों ने एक घर में शरण ली थी, जिसे जवानों ने चारों तरफ से घेर लिया था. आतंकियों पर प्रहार करते हुए नजीर वानी ने एक दहशतगर्द को मार गिराया था. जबकि जवाबी फायरिंग में वह खुद भी घायल हो गए थे.

आतंकियों की गोली से जख्मी होने के बावजूद नजीर वानी ने उस घर में छुपे आतंकियों को भागने नहीं दिया. लांस नायक नजीर आतंकियों के भाग निकलने के रास्ते पर डटे रहे और उन्होंने एक और आतंकी को मौत के घाट उतार दिया. हालांकि, इस ऑपरेशन में दहशतगर्दों की गोलियां का निशाना बने नजीर वानी भी शहीद हो गए.

नजीर वानी की इस बहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र सम्मान देने का फैसला किया गया है. राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से बताया गया है कि नजीर वानी एक बेहतर सैनिक थे और उन्होंने हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन में साहस दिखाया. बता दें कि नजीर वानी की जांबाजी के लिए उन्हें दो बार सेना मेडल भी मिल चुका है.

नजीर वानी कुलगाम के चेकी अश्‍मूजी गांव के रहने वाले थे. नजीर के परिवार में उनकी पत्‍नी और दो बच्‍चे हैं. साल 2004 में नजीर वानी ने टेरिटोरियल आर्मी से सेना में अपनी सेवा देनी शुरू की थी. 2007 में उन्हें पहला सेना मेडल और 2017 में दूसरा सेना मेडल दिया गया.

सिलसिला रुकने वाला नहीं है.

"इस तरह के विज्ञापनों की शुरुआत भर हुई है. शायद एक समय वह भी आएगा जब ऐसे विज्ञापन बहुतायत में दिखेंगे, लेकिन निकट भविष्य में ऐसा होने वाला नहीं है."

मल्होत्रा कहती हैं, "लोग अब उतने विज्ञापन नहीं देखते जितना पहले देखा करते थे. इसलिए आपको कुछ ऐसा कहने या करने की ज़रूरत होती है जो लोगों का ध्यान खींचे."

विज्ञापनों को बढ़ाने में सोशल मीडिया का भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है.

मल्होत्रा का कहना है कि जिलेट ने हैशटैग का इस्तेमाल करके संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर ऑनलाइन बहस जारी रखना चाहती है.

सैद बिज़नेस स्कूल के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी सेंटर फ़ॉर कॉरपोरेट रीप्यूटेशन के डायरेक्टर रूपर्ट यंगर को लगता है कि आने वाले दिनों में इस तरह के विज्ञापन आम हो जाएंगे.

"नई नौकरियों में आ रहे युवा नियोक्ता चुनते समय सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखते हैं."

यंगर का कहना है कि पेटागोनिया जैसी कंपनियां जो अपने सामाजिक उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट हैं, बहुत कुछ हासिल कर सकती हैं.

प्रचार कंपनी इडेलमैन के 2018 के एक अध्ययन से पता चला कि दुनिया भर में दो-तिहाई उपभोक्ता अपने सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर ख़रीदारी करते हैं.

पिछले साल के मुक़ाबले यह आंकड़ा औसत रूप से 13 फीसदी बढ़ा. ब्रिटेन में इसमें 20 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई.

यंगर कहते हैं कि जैसे-जैसे सामाजिक मुद्दों वाले संदेश आम हो रहे हैं, ब्रांड उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए अलग-अलग तरकीबें अपनाएंगे.

"कुछ ब्रांड सोशल मीडिया पर भरोसा करेंगे तो कुछ की रणनीति दूसरी तरह से पहुंच बढ़ाने की होगी. कुछ ब्रांड आंतरिक संचार और समूह-स्तर के बयानों और प्रतिबद्धताओं पर ध्यान देंगे."

"सवाल है कि यदि सामाजिक संदेशों वाले विज्ञापन आम हो जाएंगे तो क्या वे प्रभावी रहेंगे? ये तो संभव नहीं है कि हम हर संदेश पर उछल पड़ें. ये बेहद उबाऊ और थकाऊ होगा."

"ये संवेदनाओं को कम कर देगा. ठीक उसी तरह जैसे अब लोग बैनर पर ध्यान नहीं देते. इसीलिए वेबसाइटों पर बैनर वाले विज्ञापन ग़ायब हो रहे हैं."

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